हाथी के दांत खाने के अलग, दिखाने के अलग

शबनम मौसी को विजय श्री दिलवाकर मतदाताओं ने यह संदेश भी दिया कि योग्य, निष्ठïावान, ईमानदार प्रत्याशी के अभाव में कहीं किन्नर एक अच्छा उम्मीदवार है।

>> एस.सी. कटारिया, रतलाम
योग्य व प्रतिभा संपन्न जनों द्वारा प्रजातांत्रिक चुनाव प्रणाली में हिस्सेदारी नहीं करने से भी लोकतंत्र की फजीहत हो रही हे। श्रीपाल नाइक तथा शबनम मौसी का विधानसभा का प्रत्याशी बनना आम जनता का हमारी वर्तमान चुनाव प्रणाली के विरोध का प्रतिकात्मक आक्रोश है। शबनम मौसी को विजय श्री दिलवाकर मतदाताओं ने यह संदेश भी दिया कि योग्य, निष्ठïावान, ईमानदार प्रत्याशी के अभाव में कहीं किन्नर एक अच्छा उम्मीदवार है।
भारतीय लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण अध्याय चुनाव को धन व बाहुबल की राजनीति से विशेष खतरा है। चुनाव आयोग द्वारा इस पर अंकुश लगाने व विभिन्न कानूनों के माध्यम से चुनाव में व्याप्त विसंगतियों पर लाम खिंचने पर अभी हाल में हुए निर्वाचनों पर काफी फर्क पड़ा है और राजनीति की दशा-दिशा ही बदल गई। फिर भी अभी चुनावों में जिस तरह काले या सफेद धन का बेरहमी से व्यय हुआ वह चिंताजनक है।
विभिन्न प्रत्याशियों ने चुनाव में किए गए खर्च ब्यौरे को जिस प्रकार चुनाव आयोग को प्रेषित किया, वह संदिग्ध होकर यूं कहा जाए की हाथी के दांत खाने के अलग और दिखाने के अलग।
ऐसी दशा में इंदौर के विधानसभा क्षेत्र क्रमांक चार के निर्दलीय प्रत्याशी श्रीपाल नाइक, जिनका व्यवसाय भिक्षावृत्ति है, चुनाव में मात्र 13 हजार रुपए खर्च किए। बात यह भी महत्वपूर्ण है कि चुनाव प्रचार के दौरान उसने अपने अन्य अपने अन्य प्रतिद्वंद्वियों को वोटों के लिए उन्हें नकली भिखारी बताया, जो एक कटू सत्य को उजागर करता है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता और सक्रियता की अनेक अच्छी चीजों की मतदाताओं को आशा है।
(लेखक सेवा निवृत्त रजिस्ट्रार हैं।)

Comments

Mired Mirage said…
अच्छी जानकारी दी है। भिक्षक भी जब चुनाव लड़ेंगे व जीतेंगे तो यह कहा जा सकेगा कि सरकार हम सबका प्रतिनिधित्व कर रही है। अब तक चोर डाकू तो चुनाव लड़ते व जीतते थे।
घुघूती बासूती

Popular posts from this blog

अब नहीं होती बाल सभाएं, केवल एक दिन चाचा नेहरू आते हैं याद

निरंतर लिखो, आलोचकों की परवाह मत करो -बैरागी

व्यंग्य: छुटभैये नेताजी और नाम