>>प्रियेश कोठारी/पंकज व्यास, रतलाम
लोकसभा चुनाव के बाद काफी इंतजार करवाने के बाद आखिरकार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के नेतृत्व में मध्यप्रदेश मंत्री मंडल का विस्तार भाजपा ने किया, उसके बाद जो परिदृश्य बन रहा है, उससे करीब-करीब सबको समझ में आ जाना चाहिए कि मंत्रीमंडल विस्तार में इतनी देर क्यों हुई?
देर से ही सही मंत्रीमंडल का विस्तार हुआ और उसका असर सब और दिखने लगा है। अगर मंत्रीमंडल विस्तार और उसके आमजन पर प्रभाव को तथा नगरीय निकाय के चुनावों पर असर देखना है, तो मध्यप्रदेश के रतलाम जिले की आलोट विधानसभा क्षेत्र से मनोहर ऊंटवाल को नगरीय प्रशासन एवं विकास राज्यमंत्री बनाने के बाद जो परिदृश्य उभर रहा है, उसे ही आप समझ लेंगे, तो भाजपा की सत्ता की राजनीति को आसानी से समझा जा सकेगा।
असल में, इस मंत्रीमंडल विस्तार में भाजपा ने नगरीय निकाय चुनाव का पूरा ध्यान रखा था । रतलाम में भाजपा की काफी फजीहत पिछले दिनों हुई है और पूरी संभावना रही है कि इस बार भाजपा नगर निगम पर शायद ही काबिज हो पाए, लेकिन मनोहर ऊंटवाल के मंत्री बनाए जाने के बाद परिदृश्य बदल रहा है और भाजपा का पक्ष मजबूत होता दिख रहा है और संभव हो कि आने वाले समय में गुटबाजी अपना असर न दिखाए। आईए समझते हैं, रतलाम की राजनीति के बहाने प्रदेश में भाजपा की सत्ता की राजनीति को।
मनोहर ऊंटवाल मूलत: बदनावर जिला धार के हैं। वे बदनावर में पार्षद भी रह चुके हैं। वर्तमान में रतलाम जिले की विधानसभा सीट से विधायक और अब नगरीय निकाय चुनाव की घोषणा के कुछ ही पहले नगरीय प्रशासन एवं विकास राज्यमंत्री।
रतलाम की बात करें, तो रतताम की भाजपा में स्पष्टï रूप से दो गुट नजर आते हैं, एक महापौर आशा मौर्य समर्थित गुट, तो दूसरा पूर्व गृहमंत्री हिम्मत कोठारी समर्थित गुट। प्रदेश में भाजपा की सरकार रही, बावजूद इसके दोनों गुटों की आपसी खींचतान के कारण रतलाम विकास में पिछड़ता गया। निगम में भाजपा की परिषद और प्रदेश में भाजपा की सरकार होने के बावजूद संतोष जनक विकास नहीं हुआ। पूरे कार्यकाल में महापौर आशा मौर्य समर्थित गुट और पूर्व गृहमंत्री हिम्मत कोठारी समर्थित गुट के खींचतान के चर्चे आम रहे। एक ही पार्टी याने भाजपा में एक गुट पक्ष की, तो दूसरा गुट विपक्ष की भूमिका निभाता रहा। नगर निगम में पूर्व गृहमंत्री के गुट ने विपक्ष की भूमिका निभाते हुए, खुद भाजपा की महापौर की खिंचाई की, तो नगर की राजनीति में महापौर गुट गृहमंत्री हिम्मत कोठारी के लिए विपक्ष बना।
कांग्रेस के नेता और पार्षद के लिए नगर निगम और शहर की राजनीति में विपक्ष की भूमिका निभाने की जगह नहीं बची। यह कहा जाए, तो कोई अतिश्योक्ति पूर्ण बात नहीं होगी कि कांग्रेस मूक दर्शक की भूमिका में नजर आई और कभी-कभार हरकत में आई थी, तो ऐसा लगा जैसे किसी कवि सम्मेलन में दर्शक हुटिंग कर रहे हों। कांग्रेस को पूरी उम्मीद थी कि भाजपा की आपसी खींचतान और लोगोंं में फजीहत का फायदा उसे चुनावों में जरूर मिलेगा, पर अफसोस कि विधानसभा चुनाव में, भाजपा प्रत्याशी पूर्व गृहमंत्री के खिलाफ खड़े निर्दलीय प्रत्याशी पारस सकलेचा दादा, बाजी मार गए, हिम्मत कोठारी हार गए और कांग्रेस के प्रत्याशी प्रमोद गुगालिया देखते रह गए।
यहां उल्लेखनीय बात जो सब जानते हैं, वह यह है कि तत्कालीन निर्दलीय प्रत्याशी और वर्तमान रतलाम नगर विधायक पारस सकलेचा पूर्व में कांग्रेस की ओर से विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी रह चुके हैं और हिम्मत कोठारी से हार चुके थे। वही दादा बाद में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में खड़े हुए और भाजपा प्रत्याशी पूर्व गृह मंत्री हिम्मत कोठारी के करीब 30 साल के दौरान उपजे असंतोष को दादा ने खूब भूनाया और हिम्मत कोठारी को हार का स्वाद चखाया, लेकिन जिस भाजपा को विधान सभा में हराया था, उसी को लोकसभा चुनाव में पारसदादा ने समर्थन दे डाला और कांग्रेसियों को हतप्रभ कर डाला था। दादा युवाम नामक जो शैक्षणिक संस्था चलाते हैं, उसका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें फायदा चुनावों में मिला।
अब, दादा नगरीय निकाय चुनाव कि घोषणा के कुछ पहले ही जिन मनोहर ऊंटवाल को नगरीय प्रशासन एवं विकास राज्यमंत्री बनाया गया है, के स्वागत कार्यक्रमों में नजर आए हैं और कदाचित आगे भी साथ में रहेंगे।
एक बार फिर, संसदीय चुनाव के बाद भाजपा उम्मीदवार की हार के बाद और मनोहर ऊंटवाल के मंत्री बनाए जाने से पहले लग रहा था कि भाजपा की गुटबाजी और आपसी फजियत का लाभ कांग्रेस को नगरीय निकाय चुनाव में जरूर मिलेगा, लेकिन राज्यमंत्री बनाए जाने के बाद परिदृश्य बदला है।
मनोहर ऊंटवाल ने मंत्री बनने के बाद शहर में आते ही पूर्व गृह मंत्री हिम्मत कोठारी से सौजन्य मुलाकात की और उनके (श्री ऊंटवाल) और हिम्मत कोठारी के बीच पिता-पुत्र का संबंध बताया। साथ ही अपने आपको कोठारी गुट का बताया। दूसरी ओर श्री ऊंटवाल ने एक चतुर राजनीतिज्ञ की तरी महापौर गुट के साथ को भी नहीं छोड़ा, या यों कहें कि उनके स्वागत कार्यक्रम ही महामौर आशा मौर्य समर्थित गुट और विधायक पारस सकलेचा की लॉबी के प्रायोजित थे, तो कोई अति न हो। महापौर के साथ पारस दादा सकलेचा प्राय: शुरू से कार्यक्रमों में नजर आते रहे हैं।
अब स्थिति ऐसी बनती है कि रतलाम में तो मनोहर ऊंटवाल ने मंत्री बनने के बाद भाजपा की राजनीतिक परिदृश्य को बदल कर रख दिया है और नगरिय निकाय चुनाव के लिए वातावरण भाजपा के पक्ष में बनता नजर आ रहा है, वे बड़ी चतुराई से भाजपा में गुटों के बीच पड़ी खाई को पाटने की कोशिश कर रहे हैं, और आगे भी करेंगे । दूसरी तरफ वे आलोट विधानसभा से विधायक है, उस क्षेत्र में तो भाजपा के लिए माहौल बनना तय ही है। साथ ही उनके गृह नगर बदनावर जहां से वे पार्षद रह चुके हैं, वहां भी भाजपा को नगरीय निकाय चुनाव में कोई मशक्कत हो, ऐसा कुछ नजर नहीं आता।
स्पष्टï है, मनोहर ऊंटवाल के मंत्री बनाए जाने से दो जिलों रतलाम तथा धार की विधानसभा क्षेत्रों के नगरीय निकाय चुनाव सीधे तौर पर प्रभावित होंगे, याने मनोहर ऊंटवाल को मंत्री बनाया है, तो एक तीर से कई जगह निशाने साधने की कोशिश। रतलाम के बहाने प्रदेश में बीजेपी की सत्ता की राजनीति को समझने के मायने यही है कि जिस तरह से रतलाम में मंत्री मंडल विस्तार के बाद जो परिदृश्य बन रहा है और गुटों में बंटी बीजेपी को मनोहर ऊंटवाल जैसे नेता एक करने की चाहत रखते हैं, वैसे ही अन्य जगहों पर भी मंत्री मंडल विस्तार के बाद प्रभाव पड़ रहा होगा।
इतना निश्चित मानकर चलिए कि बीजेपी ने मंत्री मंडल विस्तार में नगरीय निकाय के चुनावों का खासा ध्यान रखा गया है।
जब बात विपक्ष की हो याने कांग्रेस की, तो कमोबेश पूरे प्रदेश में कुछ मौकों को छोड़कर कांग्रेस ने दर्शक की भूमिका बखूबी अदा की है, यह बात कांग्रेस के लिए इन नगरीय निकाय चुनावों में चिंता का कारण बन सकती है। देर से ही सही, लेकिन कांग्रेस के लिए यह सक्रिय होने का वक्त है। अभी भी देर नहीं हुई है, अब भी आमजन में पैंठ बढ़ाए। फिलहाल, तो भाजपा ने मंत्रीमंडल विस्तार के बहाने नगरीय निकाय चुनावों को साधने की कोशिश की है। उसकी कोशिश कितनी कामयाब होगी, आप सब जानते हैं कि यह तो भविष्य के गर्भ में छुपा है।
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