pasand blogvani

प्रसंगवश: विवेकानंद जयंती और सूर्य नमस्कार 12 जनवरी, ऊर्जावान, विवेकवान युवा भारत के लिए आओ करें सूर्य नमस्कार

Monday, January 11, 2010

-पंकज व्यास, रतलाम
 12 जनवरी को विवेकानंद जयंती मनाई जाती है। स्वामी विवेकानंद को कौन नहीं जानता? उनके बारे में, उनके व्यक्ति के बारे में हर भारतीय भलीभांति परिचित होगा।
सब जानते हैं कि किस तरह स्वामी विवेकानंद ने अपने विवेक से, अपनी मेधा से पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति का परचम फहराया। भारत से लेकर शिकांगो सम्मेलन तक स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति की अक्षुण्य पताका फहराई है। भारतीय संस्कृति, ज्ञान विज्ञान के आकाश में सूर्य की भांति दैदिप्यमान है विवेकानंद।

 सूर्य विवेक उत्पन्न करता है, मेधा बढ़ाता है, ज्ञान देता है, विज्ञान देता है, बल देता है, बुद्धि देता है। वेदों से लेकर पुराणों तक सूर्य की सविता देवता के रूप में उपासना हुई है, स्तुति की गई है। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र में सविता देवता की उपासना है। सूर्य को प्रकट, जाग्रत देव माना गया है। जैसे सूर्य की रश्मियां सारे जहान का पालन पोषण निष्पक्ष भाव से करती है, वही रवि मेरी भी बुद्धि का विस्तार करें, ज्ञान दें, मेधा दें, इसी भावना के साथ सूर्य नमस्कार किया जाता है।

मध्यप्रदेश सरकार, शिवराज सरकार इस दिन सूर्य नमस्कार का विशाल सामूहिक आयोजन करती है। प्रदेश के सवा लाख स्कूल, कॉलेजों  में सामूहिक सूर्य नमस्कार का विशद आयोजन शिवराज सरकार करती आ रही है।
सूर्य नमस्कार तो एक प्रतीक है। सूर्य के सामने कुछ पल गुजारने का माध्यम है। कुछ लोग धूप स्नान भी करते हैं।  सूर्य की किरणें विटामिन डी की वाहक है। प्रात:काल में सूर्य की रश्मियां शरीर पर पड़ती है, लावण्य का विस्तार होता है, सुंदरता बढ़ती है, आकर्षण बढ़ता है।  व्यक्तित्व तेजोमयी होता है। ऊर्जा का संचार होता है, मन प्रफुल्लित होता है। प्रात: का सूर्य सुख देने वाला होता है।  सूर्य नमस्कार के माध्यम से सूर्य को हम कृतज्ञता प्रकट करते, धन्यवाद ज्ञापित करते हैं। आखिर, सूर्य प्रभात का आगाज करता है। सूर्य की रश्मियां सबका पालन करती है। जड़-चेतन को पोषित करती है।

स्वामी विवेकानंद जयंती युवा दिवस के रूप में मनाई जाती है। युवा दिवस पर सूर्य नमस्कार एक अनूठा आयोजन है। युवा ऊर्जावान होता है, युवाओं को ऊर्जा की आवश्य·ता होती है। युवाओं को ही क्यों सबको ऊर्जा चाहिए होती है और सूर्य अपार  ऊर्जा का स्त्रोत है। इसलिए हम सूर्य को नमस्कार कर ऊर्जा प्राप्त करते हैं। एक तरफ स्वामी विवेकानंद जयंती को युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है, तो दूसरी ओर सामूहिक सूर्य नमस्कार।

युवा दिवस और सूर्य नमस्कार का यह सामंजस्य भारत के स्वर्णिम भविष्य का आगाज है। भारत का भविष्य कैसा हो, यह युवाओं के कांधों पर निर्भर करेगा। अगर युवा मेधावान, ऊर्जावान, आकर्षक, जवां तो देश जवां रहेगा, देश आगे बढ़ेगा।  सूर्य नमस्कार ऊर्जा का माध्यम बनता है। आज वास्तव में देश को एक नहीं अनेकानेक विवेकानंद की जरूरत है।
इसलिए आईए विवेकानंद जयंती, युवा दिवस पर हम सूर्य के प्रति कृतज्ञता  प्रकट करें, धन्यवाद दें, वहीं मेधावान, ऊर्जावान, ज्ञानवान, विज्ञानमयी, तेजोमीय युवा भारत के लिए सूर्य को नमस्कार करें। 

Read more...

रतलाम की चुनावी चकल्लस:देखते रहिए कौन किस पर भारी है

Wednesday, December 2, 2009

पंकज व्यास, रतलाम
रतलाम। लोकल चुनाव के लिए बिसात बिछ चुकी है। कांग्रेस-बीजेपी के साथ अन्य पार्टियों ने भी अपने दाव लगा दिए हैं। निर्दलीय ताल ठोकर कर मैदान में हैं। पार्षद से लेकर महापौर पद के प्रत्याशी अपनी अपनी चालें चल रहे हैं, लेकिन इस राजनीतिक बिसात में शह और मात की चाल तो जनता  ही चलेगी।

राकेश झालानी...राकेश झालानी...
कांग्रेस में महापौर पद के दावेदार रहे और वर्तमान में निर्दलयी प्रत्याशी राकेश झालानी अपनी झांकी जमाने में जुटे हैं। जनता को उनकी झांकी जंचे इसके लिए बडिय़ा-बडिय़ा जतन कर रहे हैं। एक तरफ सुंदर सेना का प्रकल्प चलाया है, तो दूसरी तरफ चुनावी गीत गाए जा रहे हैं, जो जनता को सीधे-सीधे जंच रहे हैं, तो मनोरंजन भी कर रहे हैं। कुछ बोल देखिए- वातां करे बड़ी-बड़ी ने, लाईटा जावें घड़ी-घड़ी..., मंत्री घूमे लाल बत्ती में, ने जनता बैठे मोमबत्ती में....बढिय़ा है जी, लगे रहिए, ढूंढ के लाए हैं। छांट-छांट कर लोगों के दिमाग पर दे रहे हैं...

श्रेय तो दादा को ही जाता है
इस चुनाव में भी मार्केट में हाथ गाड़ी के द्वारा, साईकिल पर होर्डिंग लगाकर  प्रचार किया जा रहा है। सब अपने-अपने तरिके से लोगों को रिझाने की कोशिश कर रहे हैं। इस हाथगाड़ी के द्वारा प्रचलन का श्रेय तो पारस दादा को ही जाता है। विधानसभा चुनाव में दादा को इसका अच्छा रिस्पॉन्स मिला था, अब यह  प्रचार का तरिका सबको भा गया है। अच्छा है, कम खर्चें में बढिय़ा प्रचार हो जाता है। सस्ता, सुंदर..., सॉर्ट एंड स्वीट...

ये तो एक जाजम पर आ गए
बीजेपी में सब एक जाजम आने को तैयार हैं। क्या महापौर गुट, क्या कोठारी गुट। मामा (कन्हैयाला मौर्य) ने भाजपा प्रत्याशी शैलेन्द्र डागा को समर्थन दे दिया। क्या मामू..., आपने तो विपक्षियों की एकता संदेश दे दिया... अब का बोलें...?

मिलकर लडऩा, पर आपस में मत...
बीजेपी वालों ने एकता दिखाई तो अब कांग्रेस बागी उम्मीदवारा एक होने के लिए प्लान बना रहे हैं। एक साथ लडऩे का प्लान बना रहे हैं। यहां दिखेगी अनेकता में एकता और अनेकता में एकता तो हमारी विशेषता है। इसी खासियत को कांग्रेस के बागी उम्मीदवार अपना रहे हैं...चलो इस बहाने ही मन मिलेंगे, हम तो यहीं कहेंगे कि मिल के लडऩा, पर आपस में मत... देखो कांग्रेस वालों देखों यहां क्या हो रहा है...

...तो देश भी बढ़ जाएगा आगे और खुद भी
वार्ड नं. 48 से भाजपा की ओर से प्रत्याशी है दुर्गाशंकर खिची। पहले उनकी पत्नी श्रीमती लता खिची पार्षद रह चुकीं हैं। अब श्री खिची मैदान में हैं। पत्नी की पार्षदी के वक्त इन्होंने (डी.एस. खिची) ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। जनता से सीधे जुड़े रहे। पत्नी का साथ देने का मिला  गिफ्ट, इस बार खुद को मिल गया पार्टि की ओर से पक्का टिकिट... 'देश को आगे बढ़ाओÓ इनका तकिया कलाम है। हमने देखा है कि कैसे पार्टी व पार्टी के बाहर दोनों लाड़ा-लाड़ी ने सामंजस्य बिठाया..., गुटों से दूर गुट निरपेक्ष बने रहे...हम तो यही कहेंगे कि सबको साथ लेकर, सामंजस्य बिठाकर आगे बढ़ते रहेंगे, तो देश भी आगे बढ़ जाएगा और खुद भी। आखिर, रतलाम को ऐसे ही नेता की जरूरत है, जो सामंजस्य बिठाकर जनता के लिए काम कर सके। लगे रहो राजू भाई...

मजाक-मजाक में मंगलमुखी बन सकता है चुनाव...               
महापौर पद के प्रत्याशी मंगल अपनी कद काठी के कारण लोगों में चर्चा में हैं। उनका छोटा कद और मुस्कराता चेहरा सबको लूभा रहा है। लोग उनकी ओर मजाक मजाक में जा रहे हैं... भैया, मजाक-मजाक में ही मंगल के लिए यह चुनाव मंगल मय हो सकता है। हम तो यही कहते हैं कि मजाक-मजाक में चुनाव मुंगलमुखी बन जाए, तो...

और अंत में...
चुनाव प्रचार के लिए एक से एक तरिके अपनाए जा रहे हैं। एक गाड़ी निकले कि दूसरी गाड़ी आ रही है। इस सर्द मौसम में जनता को चुनावी चर्चाएं खासी गरमाहट दे रही है  सुबह से शाम तक, होटल से लेकर पान की दुकान तक, हेयरसेलुन वाले से लेकर टेम्पों तक में चुनावी चकल्लस जारी है...नेतागिरी की आई बारी है, किसी को पार्टी की तो को निर्दलीय की सवारी है, सबकी अपनी-अपनी  ढपली, अपना अपना राग जारी है, स्टाईल न्यारी है, किसकी अदा जनता को प्यारी है, भा रही है, देखते रहिए, देखते रहिए कौन किस पर भारी है...चुनावी चकल्लस जारी है...

Read more...

व्यंग्य: छुटभैये नेताजी और नाम

Monday, November 23, 2009

पंकज व्यास,रतलाम


जनता को चाहिए काम।
नेताजी को चाहिए नाम।।
जनता कहती काम बोलना चाहिए काम।
नेताजी कहते नाम होना चाहिए नाम।।
नेता-नाम की महिमा अपार।
जनता घनचक्कर बनती बारंबार।।
हर बार होता नाम का घमासान।
कभी तो कर दो नाम का सम्मान।।
नेताजी, बहुत हो गया नाम का प्रसार।
अबकी बार, कुछ तो कर दो सिरियसली काम।।
नगर निगम, नगर पालिका परिषद, पंचायतों, जनपद पंचायतों आदि के चुनाव आ गए और इसी के साथ लोकल पॉलेटिक्स में झकास निखार आने लगा है। अब, चाय की होटलों पर चुस्की लेते हुए, हेयर सेलूनों पर चुनावी कतरीन चलाते हुए, लोकल इलेक्शन की चर्चाएं होनी शुरू हो गई। ठंड अपना असर दिखा रही है, तो चुनावी गर्मी भी ठंड का असर बेअसर करने पर तुली है।
बात चली है चुनावी गर्मी की तो, बैठे बिठाए निठल्ले ठंडे-ठाये लोगों में पोलेटिक्स का करंट दौडऩे लगा है। जिसको देखो वो चुनाव में खड़ा होने की सोच रहा है, कुछ सोच ही रहे हैं, तो कुछ खड़े भी हो रहे हैं।
ऐसे ही चुनाव में खड़े होने की तमन्ना वाले एक नेताजी से हमने पूछ लिया- भैयेजी, आप खड़े हो रहे हैं। वे बोले-जी हां, जी हां। हमने कहा-भैये जीतने की अग्रिम बधाई, तो वे बोले बधाई-वधाई तो ठीक है, पर एक बात बताएं हम कोई जीतने के लिए थोड़े ही इलेक्शन में खड़े हो रहे हैं?
हमारी मोटी बुद्घि में बात घुसी नहीं। हमने तपाक से पूछ लिया-अमां, जीतने के लिए नहीं खड़े हो रहे हैं, तो फिर किसलिए...?
हमारी बात को सुनकर पहले तो छुटभैये नेताजी को हमारी बुद्घि पर तरस आया, फिर अपने ज्ञान का पिटारा खोला और हमारे कंधे पर हाथ रखते हुए अपने मुख से ज्ञान उढ़ेलने लगे व बोले-हम- हम जीतने के लिए थोड़े ही खड़े हो रहे हैं, अरे कलमकार हम तो नाम के लिए खड़े हो रहे हैं, नाम के लिए। जीते या हारे जाए भाड़ में। इसी बहाने नाम हो जाएगा, कि हम इलेक्शन में खड़े हुए थे। आगे नेताजी समझाते हुए हमसे बोले- ...और खुदा न खास्ता मजाक मजाक में जीत गए तो भैये मजा ही मजा है।
मैंने कहा- अच्छा तो ये बात है। अब हमें समझ में आया कि जगह-जगह इलेक्शन में केंडिडेटों की धड़ाधड़ भीड़ क्यों बढ़ रही है। हम तो समझे थे कि इत्ते सारे लोगों में अपने कस्बे, नगर, गांव के प्रति प्रेम उफान मार रहा है, तो कुछ काम करने के लिए लोग इलेक्शन में खड़े हो रहे हैं, पर अब सबको समझ जाना चाहिए कि यहां काम की नहीं, नाम की मारामारी है।
भैये, ये जनता समझती नहीं, हर चुनाव में नेताओं पर भनभनाती है, कि काम क्या किया, काम क्या किया.... हमरे एक फ्रेन्ड बोलते हैं, काम बोलना चाहिए काम। वही बात इस मुई जनता के दिमाग में घुसी हुई है, काम बोलना चाहिए काम।
पर इस मुई जनता को क्या मालूम कि अपने नेताजी को काम धाम से कोई मतलब नहीं, नाम में इंन्ट्रेस्ट है। जो लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है? वो जरा हमरे नेताजी से जाकर पुछिए, कि नाम में क्या रखा है? नाम की महिमा क्या है? अपने नेताजी का नाम होगा, कस्बे का नाम होगा, कस्बे का नाम होगा, तो देश का नाम होगा।
पर, क्या करें नेताजी, ये जनता नाम की महिमा समझती ही नहीं, सब आप जैसे समझदार थोड़े ही हैं। पर नेताजी, आप समझना, आप तो समझदार है। भैये जी, आप जैसे सबको नाम का चस्का नहीं लगा है और जिस दिन आपकी कृपा से जनता को नाम का चस्का लग जाएगा, उस दिन सब काम धाम बंद। नाम चमकाने का काम शुरू।
सुनकर के नेताजी बोले- वो सब तो खैर ठीक है। हम हमारा नाम और चमकाना चाहते हैं, इसलिए हमरे ऊपर वाले लीडर का जनम दिन मना रहे हैं। जरूर आईए।
तो भैया जी नेताजी ने हमें इन्वीटेशन दे दिया है। हम बड़े नेताजी का जनम दिन मनाकर आते हैं, तब तक आप नेता-नाम की महिमा समझिए और ज्यादा समझ में आ जाए, तो हमें भी समझाईए...। ठीक है ना...

पंकज व्यास,रतलाम

Read more...

स्वर्णिम मध्यप्रदेश का नारा, नारा ही न रह जाए;प्रियेश कोठारी

Thursday, November 19, 2009

सामाजिक संस्थाओं की जब तक भागीदारी नहीं बढ़ेगी, तब तक अपना मध्यप्रदेश स्थापना सप्ताह  जैसे आयोजन औपचारिक बनते रहेंगे, क्योंकि वैसे भी सरकारी महकमों के पास पहले से कई जिम्मेदारियां हैं।
प्रियेश कोठारी
मध्यप्रदेश के स्थापना दिवस के बाद एक पखवाड़े से ज्यादा समया हो गया। अब  अपने मध्यप्रदेश के विकास की बात नहीं हो रही। सरकारी तौर पर अपना मध्यप्रदेश स्थापना दिवस सप्ताह मनाया गया। 'अपना मध्यप्रदेश स्थापना सप्ताहÓ के समापन समारोह के साथ ही अपना मध्यप्रदेश की भावना लगता है बिसरने गई है।

वैसे मध्यप्रदेश की स्थापना सप्ताह  के दौरान ऐसी खबरें आती रही हैं, जिनके अनुसार अपना मध्यप्रदेश स्थापना सप्ताह औपचारिक बन कर रह गया, रस्म अदायगी के लिए अपना मध्यप्रदेश सप्ताह मनाया गया, जनता का इसमें योगदान कम रहा। बच्चों के बीच मध्यप्रदेश का स्थापना सप्ताह मना लिया गया आदि।

हालांकि, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का कहना था कि मध्यप्रदेश के  लोगों में अपना मध्यप्रदेश की भावना जाग्रत हो, मध्यप्रदेश की स्थापना के कार्यक्रम का सरकारीकरण न हो, लेकिन मुख्यमंत्री की भावना के विपरित कार्य हुआ और आयोजन औपचारिक  और रस्मअदायगी बनकर रह गया। 

असल में, जनता से जुड़े कार्यक्रमों को जनता के द्वारा, सामाजिक संस्थाओं, एनजीओ आदि के द्वारा ही संचालित करवाया जाना चाहिए, तो ही उनमें जनता की भागीदारी बढ़ेगी। वैसे भी सरकारी महकमे पर पहले ही काम का बोझ होता है, शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी होती है, ऐसे में इस प्रकार के आयोजन औपचारिकता के पर्याय बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं?

...और मध्यप्रदेश स्थापना सप्ताह के साथ भी हुआ वही। शासन-प्रशासन  के पास वैसे ही अनेकों जिम्मेदारियां होती हैं, उनके बीच अधिकारी, कर्मचारी  मध्यप्रदेश के स्थापना सप्ताह के आयोजन की तैयारी नहीं कर पाए।

अगर सामाजिक संस्थाओं, एनजीओं के हवाले आयोजन का दायित्व होता और शासन-प्रशासन व्यवस्था देखता, तो निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश के स्थापना सप्ताह की गुंज चंद दिनों में, स्थापना दिवस के एक पखवाड़े के बाद ही ठंडी नहीं होती और संभव था कि साल भर तक मध्यप्रदेश के निवासियों में अपना मध्यप्रदेश की भावना जगाने वाला माहौल बनता।

बहरहाल, जो हुआ सो हुआ। भविष्य में इस ओर ध्यान दिया जा सकता है कि ऐसे कार्यक्रमों में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने और सार्थक पहल को सार्थक परिणाम प्राप्त हो, इसके लिए ऐसे आयोजनों के संचालन, प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी सामाजिक संस्थाओं को दी जाए या उन्हें ऐसे आयोजनों में भागीदार बनाया जाए, ताकि आयोजन औपचारिक भर न रह जाए और उद्देश्य प्राप्ति की ओर अग्रसर हो, अगर ऐसा नहीं होता है, तो स्वर्णिम मध्यप्रदेश का नारा केवल नारा ही रह जाएगा।
(लेखक दैनिक प्रसारण के प्रबंध संपादक हैं)

Read more...

...तो मध्यप्रदेश में मंत्री मंडल विस्तार के बहाने, नगरीय निकाय चुनावों को साधने की कोशिश कि गई थी : राजनीतिक समीक्षा

Monday, November 16, 2009

>>प्रियेश कोठारी/पंकज व्यास, रतलाम
 लोकसभा चुनाव के बाद काफी इंतजार करवाने के बाद आखिरकार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के नेतृत्व में मध्यप्रदेश मंत्री मंडल का विस्तार भाजपा ने किया, उसके बाद जो परिदृश्य बन रहा है, उससे करीब-करीब सबको समझ में आ जाना चाहिए कि मंत्रीमंडल विस्तार में इतनी देर क्यों हुई?

देर से ही सही मंत्रीमंडल का विस्तार हुआ और उसका असर सब और दिखने लगा है। अगर मंत्रीमंडल विस्तार और उसके आमजन पर प्रभाव को तथा नगरीय निकाय के चुनावों पर असर देखना है, तो मध्यप्रदेश के रतलाम जिले की आलोट विधानसभा क्षेत्र से मनोहर ऊंटवाल को नगरीय प्रशासन एवं विकास राज्यमंत्री बनाने के बाद जो परिदृश्य उभर रहा है, उसे ही आप समझ लेंगे, तो भाजपा की सत्ता की राजनीति को आसानी से समझा जा सकेगा। 


असल में, इस मंत्रीमंडल विस्तार में भाजपा ने नगरीय निकाय चुनाव का पूरा ध्यान रखा था । रतलाम में भाजपा की काफी फजीहत पिछले दिनों हुई है और पूरी संभावना रही है कि इस बार भाजपा नगर निगम पर शायद ही काबिज हो पाए, लेकिन   मनोहर ऊंटवाल के मंत्री बनाए जाने के बाद परिदृश्य बदल रहा है और भाजपा का पक्ष मजबूत होता दिख रहा है और संभव हो कि आने वाले समय में गुटबाजी अपना असर न दिखाए। आईए समझते हैं, रतलाम की राजनीति के बहाने प्रदेश में भाजपा की सत्ता की राजनीति को।

मनोहर ऊंटवाल मूलत: बदनावर जिला धार के हैं। वे बदनावर में पार्षद भी रह चुके हैं। वर्तमान में रतलाम जिले की विधानसभा सीट से विधायक और अब नगरीय निकाय चुनाव की घोषणा के कुछ ही पहले नगरीय प्रशासन एवं विकास राज्यमंत्री।
रतलाम की बात करें, तो रतताम की भाजपा में स्पष्टï रूप से दो गुट नजर आते हैं, एक महापौर आशा मौर्य समर्थित गुट, तो दूसरा पूर्व गृहमंत्री हिम्मत कोठारी समर्थित गुट। प्रदेश में भाजपा की सरकार रही, बावजूद इसके दोनों गुटों की आपसी खींचतान के कारण रतलाम विकास में पिछड़ता गया। निगम में भाजपा की परिषद और प्रदेश में भाजपा की सरकार होने के बावजूद संतोष जनक विकास नहीं हुआ। पूरे कार्यकाल में महापौर आशा मौर्य समर्थित गुट और पूर्व गृहमंत्री हिम्मत कोठारी समर्थित गुट के खींचतान के चर्चे आम रहे। एक ही पार्टी याने भाजपा में एक गुट पक्ष की, तो दूसरा गुट विपक्ष की भूमिका निभाता रहा। नगर निगम में पूर्व गृहमंत्री के गुट ने विपक्ष की भूमिका निभाते हुए, खुद भाजपा की महापौर की खिंचाई की, तो नगर की राजनीति में महापौर गुट गृहमंत्री हिम्मत कोठारी के लिए विपक्ष बना। 

कांग्रेस के नेता और पार्षद के लिए नगर निगम और शहर की राजनीति में विपक्ष की भूमिका निभाने की जगह नहीं बची। यह कहा जाए, तो कोई अतिश्योक्ति पूर्ण बात नहीं होगी कि कांग्रेस मूक दर्शक की भूमिका में नजर आई और कभी-कभार हरकत में आई थी, तो ऐसा लगा जैसे किसी कवि सम्मेलन में दर्शक हुटिंग कर रहे हों। कांग्रेस को पूरी उम्मीद थी कि भाजपा की आपसी खींचतान और लोगोंं में फजीहत का फायदा उसे चुनावों में जरूर मिलेगा, पर अफसोस कि विधानसभा चुनाव में, भाजपा प्रत्याशी पूर्व गृहमंत्री के खिलाफ खड़े निर्दलीय प्रत्याशी पारस सकलेचा दादा, बाजी मार गए, हिम्मत कोठारी हार गए और कांग्रेस के प्रत्याशी प्रमोद गुगालिया देखते रह गए।

यहां उल्लेखनीय बात जो सब जानते हैं,     वह यह है कि तत्कालीन निर्दलीय प्रत्याशी और वर्तमान  रतलाम नगर विधायक पारस सकलेचा पूर्व में कांग्रेस की ओर से  विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी रह चुके हैं और हिम्मत कोठारी से हार चुके थे। वही दादा बाद में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में खड़े हुए और भाजपा प्रत्याशी पूर्व गृह मंत्री हिम्मत कोठारी के करीब 30 साल के दौरान उपजे असंतोष को दादा ने खूब भूनाया और हिम्मत कोठारी को हार का स्वाद चखाया, लेकिन जिस भाजपा को विधान सभा में हराया था, उसी को  लोकसभा चुनाव में पारसदादा ने समर्थन दे डाला और कांग्रेसियों को हतप्रभ कर डाला था। दादा युवाम नामक जो शैक्षणिक संस्था चलाते हैं, उसका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें फायदा चुनावों  में मिला।

अब, दादा नगरीय निकाय चुनाव कि घोषणा के कुछ पहले ही जिन मनोहर ऊंटवाल को नगरीय प्रशासन एवं विकास राज्यमंत्री बनाया गया है, के स्वागत कार्यक्रमों में नजर आए हैं और कदाचित आगे भी साथ में रहेंगे।

एक बार फिर, संसदीय चुनाव के बाद भाजपा उम्मीदवार की हार के बाद और मनोहर ऊंटवाल के मंत्री बनाए जाने से पहले लग रहा था कि भाजपा की गुटबाजी और आपसी फजियत का लाभ कांग्रेस को नगरीय निकाय चुनाव में जरूर मिलेगा, लेकिन राज्यमंत्री बनाए जाने के बाद परिदृश्य बदला है।

मनोहर ऊंटवाल ने मंत्री बनने के बाद शहर में आते ही पूर्व गृह मंत्री हिम्मत कोठारी से सौजन्य मुलाकात की और उनके (श्री ऊंटवाल) और हिम्मत कोठारी के बीच पिता-पुत्र का संबंध बताया। साथ ही अपने आपको कोठारी गुट का बताया। दूसरी ओर श्री ऊंटवाल ने एक चतुर राजनीतिज्ञ की तरी महापौर गुट के साथ को भी नहीं छोड़ा, या यों कहें कि उनके स्वागत कार्यक्रम ही महामौर आशा मौर्य समर्थित गुट और विधायक पारस सकलेचा की लॉबी के प्रायोजित थे, तो कोई अति न हो। महापौर के साथ  पारस दादा सकलेचा प्राय: शुरू से कार्यक्रमों में नजर आते रहे हैं।

अब स्थिति ऐसी बनती है कि रतलाम में तो मनोहर ऊंटवाल ने मंत्री बनने के बाद भाजपा की राजनीतिक परिदृश्य को बदल कर रख दिया है और नगरिय निकाय चुनाव के लिए वातावरण भाजपा के पक्ष में बनता नजर आ रहा है, वे बड़ी चतुराई से भाजपा में गुटों के बीच पड़ी खाई को पाटने की कोशिश कर रहे हैं, और आगे भी करेंगे । दूसरी तरफ वे आलोट विधानसभा से विधायक है,  उस क्षेत्र में तो भाजपा के लिए माहौल बनना तय ही है। साथ ही उनके गृह नगर बदनावर जहां से वे पार्षद रह चुके हैं, वहां भी भाजपा को नगरीय निकाय चुनाव में कोई मशक्कत हो, ऐसा कुछ नजर नहीं आता।

स्पष्टï है, मनोहर ऊंटवाल के मंत्री बनाए जाने से दो जिलों रतलाम तथा धार की विधानसभा क्षेत्रों के नगरीय निकाय चुनाव सीधे तौर पर प्रभावित  होंगे, याने मनोहर ऊंटवाल को मंत्री बनाया है, तो एक तीर से कई जगह निशाने साधने की कोशिश। रतलाम के बहाने प्रदेश में बीजेपी की सत्ता की राजनीति को समझने के मायने यही है कि जिस तरह से रतलाम में मंत्री मंडल विस्तार के बाद जो परिदृश्य बन रहा है और गुटों में बंटी बीजेपी को मनोहर ऊंटवाल जैसे नेता एक करने की चाहत रखते हैं, वैसे ही अन्य जगहों पर भी मंत्री मंडल विस्तार के बाद प्रभाव पड़ रहा होगा।
इतना निश्चित मानकर चलिए कि बीजेपी ने मंत्री मंडल विस्तार में नगरीय निकाय के चुनावों का खासा ध्यान रखा गया है।
जब बात विपक्ष की हो याने कांग्रेस की, तो कमोबेश पूरे प्रदेश में कुछ मौकों को छोड़कर कांग्रेस ने दर्शक की भूमिका बखूबी अदा की है, यह बात कांग्रेस के लिए इन नगरीय निकाय चुनावों में चिंता का कारण बन सकती है। देर से ही सही, लेकिन कांग्रेस के लिए यह सक्रिय होने का वक्त है। अभी भी देर नहीं हुई है, अब भी आमजन में पैंठ बढ़ाए। फिलहाल, तो भाजपा ने मंत्रीमंडल विस्तार के बहाने नगरीय निकाय चुनावों को साधने की कोशिश की है। उसकी कोशिश कितनी कामयाब होगी, आप सब जानते हैं कि यह तो भविष्य के गर्भ में छुपा है।

Read more...

अब नहीं होती बाल सभाएं, केवल एक दिन चाचा नेहरू आते हैं याद

Friday, November 13, 2009

पंकज व्यास,रतलाम

 आप अपने बचपन को याद कीजिए। बचपन में चले जाईए। स्कूल के वो दिन याद करें, जब हर शनिवार को आधी छुट्टी के बाद बाल सभा होती, बाल सभा की तैयारी जोरों से की जाती। याद करें वो नजारा, जब मास्टर जी नाम पुकारते और कविता, कहानी, चुटकुले आदि पढऩे के लिए बाल सभा में बकायदा बुलाते। याद करें उस लम्हे को जब मास्टरजी उन दोस्तों को जबरन बाल सभा में खड़ा कर बुलवाते, कुछ भी कहने के लिए प्रेरित करते....

याद आया? अगर आप को याद आ रहा है, तो आप के सामने वो सारे पल आ रहे होंगे, जब बाल सभा होती थी। पूरे सप्ताह आपको और आपके दोस्तों को शनिवार का इंतजार रहता इंतजार रहता।
हर शनिवार को आधी छुट्टी में बाल सभा का कार्यक्रम होता, जो बच्चों की प्रतिभाओं को विकसित करने के लिए, व्यक्तित्व विकास के लिए एक मंच का काम करतीं। 


बाल सभा, नाम से ही स्पष्ट है, बच्चों का कार्यक्रम। चूंकि बच्चों की बात उठती है, तो सहज में ही चाचा नेहरू याद आ जाते। बाल सभा में बच्चों के व्यक्तित्व विकास के बहाने, प्रतिभा निखारने के बहाने चाचा नेहरू को याद कर लिया जाता। 


वक्त बदला, वक्त ने अपनी चाल बदली और हर शनिवार होने वाली बाल सभा महिने के आखरी शनिवार को होने लगी और कब यह बाल सभा का क्रम समाप्त हो गया, पता ही नहीं चला। अधिकांश स्कूलों में अब बाल सभाएं नहीं होती। बाल सभा नहीं होती तो बच्चों के चाचा नेहरू याद नहीं आते और याद आते हैं, तो अब केवल एक ही दिन बाल दिवस पर। वह भी रस्म अदायगी दूसरे ही दिन बच्चे चाचा नेहरू को भूला-बिसार दें, तो इसमें आश्चर्य ही क्या? एक तो बाल सभा अब होती नहीं और चाचा नेहरू को याद करने का वक्त ही नहीं। रही सही कसर टीवी ने पुरी कर दी और टीवी में भी बच्चे कार्टून में रम जाते। 


अब हालात ये बनते है कि चाचा नेहरू अब बच्चों के प्यारे चाचा नेहरू नहीं रहे, अब स्पाईडर मे, सुपर मेन आदि कार्टून पात्र उन्हें आकर्षित आकर्षित करते हैं। यहां यही समझ आता है कि बाल सभा की इस टूट चुकी कड़ी के बीच बच्चों के बीच चाचा नेहरू को याद रखना है, तो माय फे्रंड गणेशा, कृष्णा, हनुमान की तरह चाचा नेहरू को भी बच्चों के सामने लाना होगा, नहीं तो साल में एक बार बाल दिवस मना लिया और बाल सभा तो होती नहीं, इसलिए एक दिन चाचा नेहरू याद आते रहेंगे, और बच्चे उन्हें भुलाते-बिसराते रहेंगे।


 इसको ITNN पर  भी पढ़ सकते है आप 


Read more...

केवल ‘एक लाईन’ लिखने से अखबार वाले जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते – पंकज व्यास

Thursday, November 12, 2009



newspapers 237x300 केवल ‘एक लाईन’ लिखने से अखबार वाले जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते   पंकज व्यासअधिकांश अखबारों में वर्गकृत, डिस्प्ले क्लासिफ़ाईड विज्ञापनों की भरमार होती है। इनमें आवश्यकता, टयूशन-शिक्षा, ज्योतिष, वास्तुकर, मशीन उपकरण, मोबाईल, खरीदना-बेचना, व्यापारी, ब्यूटी पार्लर-पिटनेस आदि के वर्गीकरण के साथ विज्ञापन प्रकशित किए होते हैं।
इन विज्ञापनों में की विज्ञापन ऐसे होते हैं, जिन पर पृथम दृष्टा ही विश्वास नहीं किया जा सकता है और कहा जा सकता है कि ये फर्जीवाडे़ को फैला रहे हैं।
इन विज्ञापनो में से किसी में नौकरी के विज्ञापन होते हैं, तादाद बहुत होती है, पेमेन्ट बहुत ज्यादा लिखी होती है, जिन पर सहज विश्वास नहीं किया जा सकता है। कोई विज्ञापन बाबाओं, तांत्रिकों के होते हैं। तो कोई मसाज पार्लर, ब्यूटिपार्लर के होते हैं, जिनमें मसाजर की जरूरत है और पेमेन्ट 10 से 15 हजार रोजाना कमाने की बात होती है। कहीं व्यापार के लिए आमंत्रण होता है, तो कहीं सेक्स समस्याओं को दूर करने के दावे…. कहीं नेटवर्क माकेर्टिंग के लालच, तो कहीं कुछ और…
कुल मिलाकर अखबार के पन्नो के विज्ञापनों से पटे होते हैं, जिन पर सहज विश्वास नहीं होता है और विश्वास करता है, तो ठगे जाने की पूरी संभावना होती है। इन विज्ञापनों को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये किसी किस्म के होते हैं।
‘पाठकों को सलाह दी जाती है कि किसी भी विज्ञापन पर कर्रवाई करने से पूर्व आवश्यक/संपूर्ण जानकारी कर लेवें। यह समाचार पत्र विज्ञापनदाता द्वारा दिए गए किसी भी प्रकार के दावे/प्रस्तुतिकरण के लिए जिम्मेदार नहीं है।’ ऐसी या इस आशय की पन्नो पर कहीं प्रायः मिल जाया करती हैं। साफ जाहिर है विज्ञापनों के दुष्परिणामों अगर सामने आते हैं, तो इनके प्रकाशन की जिम्मेदारी से बचने के लिए इस प्रकार की लाईन लगा दी जाती है।
यहां सवाल उठता है कि क्या इस प्रकार के विज्ञापनों के संबंध में समाचार-पत्र की, अखबार की कोई जिम्मेदारी नहीं होती है? जवाब में इस आशय के जवाब होते हैं कि ये तो विज्ञापन है, लोग पैसे देते हैं और हम(अखबार वाले) विज्ञापन लगा देते हैं। ये तो बिजनेस है….
तो क्या बिजनेस के लिए जिम्मेदारी से मुंह मोड़ा जा सकता है? नहीं कतई नहीं। रुपए-पैसे देकर अखबार में यदि किसी भी प्रकार के विज्ञापन छापा जा सकता है, तो कल ये आतंकवादी, नक्सलवादी विज्ञापन छपवाना चाहेंगे, तो क्या अखबार वाले छाप देंगे? ….और जिम्मेदारी से मुक्ति के आशय को इंगित करती लाईन लगा देने से क्या जिम्मेदारी से मुक्त हो जाऐंगे? जवाब न में ही होगा।
…. तो फिर आम रूप से प्रथम दृष्ट्या ही फर्जी लग रहे विज्ञापन के माध्यम से कोई ठगी के शिकार होता है, तो अखबार वालों की जिम्मेदारी नहीं है?
यहां गौर करने लायक बात यह है कि अखबार के बिजनेस, विज्ञापनों के बिजनेस अन्य बिजनेसों से अलग है। जिस प्रकर खबरों के असर समाज पर पड़ता है, वैसे ही विज्ञापनों के भी असर समाज पर पड़ता है और एक लाईन लिख भर देने से विज्ञापनों से पड़ने वाले असरों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है। अगर मुंह मोड़ रहे हैं, तो यह जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना है। आपक क्या कहना है?
पंकज व्यास, रतलाम

Read more...