तो फिर कैसे होगी सही व सटिक भविष्यवाणी, हमें बदलनी होगी भूमिका

Tuesday, November 10, 2009

तो फिर कैसे होगी सही व सटिक भविष्यवाणी, हमें बदलनी होगी भूमिका

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मुस्लिम कब्रिस्तान में प्रार्थना सभा भवन एवं कमरा निर्माण कार्य का भूमि पूजन, पंडित ने किए मंत्रोच्चार, शहर काजी ने पढ़ी फातेहा

Saturday, November 7, 2009

 बदनावर.  नगर पंचायत बदनावर द्वारा जनभागीदारी से स्थानीय मुस्लिम कब्रिस्तान में लगभग 8.00 लाख की राशि से निर्मित होने वाले प्रार्थना सभा भवन एवं कमरा निर्माण कार्य का भूमि-पूजन संपन्न किया गया। भूमि-पूजन भाजपा नगर मंडल अध्यक्ष प्रजेन्द्र भट्टï, शहर काजी सलीमउल्ला एवं आलीम अख्तरअली के द्वारा किया गया।
इस अवसर पर नगर पंचायत अध्यक्ष प्रेमचन्द परमार, मंडी बोर्ड डायरेक्टर राजेश अग्रवाल, भूमि विकास बैंक अध्यक्ष महेन्द्र सिंह शक्तावत, जिला भाजपा किसान मोर्चा अध्यक्ष मोहन सिंह चौहान, एल्डरमेन रमेश चन्द्र यादव व राजेन्द्र सराफ, पार्षद श्रीमत जिनत बाबा, प्रकाश नागरू, जहांगीर मन्सूरी, पंकज ठाकूर, लियाकरत अली, यासीन अली, शरीफ उस्ताद, मुजफ्फर उस्ताद, साजिल अली, शहजाद काला, ईकबाल कुरैशी, शेदू चाचा, पप्पू कुरैशी एवं क्षेत्र के सैंकड़ों नागरिक उपस्थित थे।
अतिथियों का स्वागत मुख्य नगर पालिका अधिकारी अशोक कुमार शर्मा ने किया। कार्यक्रम में पंडित द्वारा मंत्रोच्चार किया गया एवं शहरकाजी एवं आलीम सा द्वारा फातेहा पड़ी गई, जो सद्भाव एवं भाईचारे की मिसाल बनी। कार्यक्रम का संचालन एवं आभार प्रदर्शन सदर उर्स व ताकीर कमेटी शकिल खान ने किया।
यह जानकारी मुख्य नगर पालिका अधिकारी नगर पंचायत बदनावर ने दी।

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प्रभाष जी चले गए, जैसे ही पता चला धक्का लगा

पत्रकारिता के शलाखा पुरुष प्रभाष जोशी जी चले गए, जैसे ही यह बात मैंने सुनी धक्का लगा, आघात पहुंचा, मन में एक बोझ-सा लगा, दिल में एक दर्द उठा, वह अब भी दिल के कौने में घर कर गया है।
कभी प्रभाष जी से प्रत्यक्ष मुलाकात हुई नहीं, मिलने की लालसा मन में ही रह गई..., लेकिन उनके लेख, पत्रकारिता के संबंध में विचार, साक्षात्कार आदि पढऩे को मिलते, तो ऐसा लगता जैसे वे खुद रूबरू होकर कुछ सीखा रहे हों। परोक्ष रूप से प्रेरणा मिलती

प्रभाष जी ऐसे व्यक्तिव में शुमार थे, जिनसे प्रत्यक्ष रूप से कोई भी मिला हो, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से कहीं संपर्क हुआ हो, तो भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। पत्रकारिता में आंदोलन खड़ा करने की बात करने वाले प्रभाष जोशी की कमी वाकई खलती रहेगी....

फिलहाल तो ज्यादा कुछ नहीं दर्द भरे दिल से, भिगी आंखों से प्रभाष जोशी जी को नमन.... श्रृद्घासूमन अर्पण....
>>पंकज व्यास, रतलाम

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वंदे मातरम् के खिलाफ फतवा, मुसलमान खुद आए आएं, करे फतवे का विरोध, तो बने बात

Thursday, November 5, 2009

>>पंकज व्यास, रतलाम
यह पहली मर्तबा नहीं है कि वंदे मारतम् के खिलाफ फतवा जारी किया गया, वंदे मारतम् को इस्लाम विरोधी  विरोधी बताकर इसे मुसलमानों को न गाने को कहा गया है।

खबरों के अनुसार हाल ही में जब वंदे मातरम् के खिलाफ फतवा जारी किया गया, तो उसमें चिदंबरम्, बाबा रामदेव और सचिन पायलट भी मौजूद थे।

बात बात पर मुंह खोलने वाले और बयान देने के लिए लालायित नेताओं, अपनी बुद्घि का प्रदर्शन करने को उत्साहित बुद्घिजीवियों को इस प्रकार के फतवे जारी होने पर सांप क्यों सूंघ जाता है? क्यों कोई इस प्रकार के फतवों की निंदा करना जरूरी नहीं समझता? देश प्रेम के मामले में चुप क्यों?
असल में, माहौल इस प्रकार का बना दिया गया है, कि  कोई गलत बात करें और उसका विरोध किया जाए,  तो विरोध करने वाले को सांप्रदायिक करार दे दिया जाता है और सबके सब इस लिए मुंह बंद कर लेते हैं कि वंदेमातरम् का विरोध करने वालों का विरोध करेंगे, सांप्रदायिक कहलाएंगे?

ये बात सही है कि केवल वंदे मारतम् गाना ही राष्टï्र भक्ति नहीं है, लेकिन वंदेमारतम् की खिलाफत करना भी तो राष्टï्रभक्ति की श्रेणी में नहीं आता है। क्या मां की वंदना करना गलत है? कहां लिखा है कि मां की वंदना मत करो...? और फिर हम किसी और की मां की वंदना तो कर नहीं रहे, हम तो उस धरती को सलाम कर रहे हैं, जहां का अन्न हमने खाया, जहां का पानी पिया, जहां की उन्मुक्त हवा में हमने सांस ली, जहां पर हमने चलना सीखा, जहां हमने जीना सीखा....

और दुआ सलाम तो यूं भी की ही जाती है। जहां इश्क को रब का दर्जा दिया जाता है, वहां मां को, अम्मा को भारत मां की वंदना क्यों नहीं? सवाल स्वाभाविक है।

दरअसल, इन मामलों में खुद मुस्लिम बुद्घिजीवियों को आगे आने की जरूरत है। वंदे मातरम् के खिलाफ फतवे के मामले में मुसलमान खुद आए आएं, फतवे का विरोध करें तो बात बनें...

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मो. अयाज खिलजी कि कविता ...तो कोई बात बने

Friday, October 9, 2009

...तो कोई बात बने
>>मो. अयाज खिलजी, रतलाम
पत्थरों पर नाम अपना हर कोई लिख सकता है,
सागर की लहरों को रोका और रेत पर नाम लिखो
        तो कोई बात बने।

पार्टियां, मौज-मस्ती और रंगरेलियां,
खूब पैसा बहाते हैं हम इन पर,
किसी नंगे को कपड़ा और किसी भूखे को खाना खिलाएं,
        तो कोई बात बने।

भर गया है घड़ा लबालब
झूठ, भ्रष्टïाचार और अत्याचार से
इस युग में फिर एक बार कृष्ण आए
        तो कोई बात बने।

गंगोत्री से गंगासागर तक तो
मुर्दा भी चला जाता है,
अपनी शक्ति का परिचय दो
और गंगासागर से गंगोत्री तक जाओ
        तो कोई बात बने

पत्थरों पर नाम अपना, हर कोई लिख सकता है
सागर की लहरों को रोको और रेत पर नाम लिखो
        तो कोई बात बने, तो कोई बात बने।
>>मो. अयाज खिलजी, रतलाम

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help me

Thursday, October 8, 2009

आप इस ब्लॉग पर टिपण्णी देने के लियें क्लिक करें, आप टिपण्णी नहीं दे पाएंगे.  मेरे ब्लॉग आप-हम में कहीं कोई मिस्टेक आ गई है. इस कारन से टिपण्णी कोई दे नहीं पा रहा है.अगर किसी के पास इसका समाधान हो तो बताएं आभारी रहूँगा....

कृपया, समस्या का समाधान इस ब्लॉग पर बताएं...
http://pankajvyasratlam.blogspot.com
धन्यवाद्

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यह तो होना ही था: एस.सी. कटारिया

बोफोर्स घोटाले की दशकां से चली आ रही पेचीदा और रहस्यमय कार्रवाई ने अंत में जाकर दम तोड़ दिया। आखिर में वही हुआ, जिसकी संभावना थी, फाईल बंद हो गई।

इस प्रकरण के प्रमुख कथित आरोप क्वात्रोची पर कानून व नियम का शिकांजा राजनीति के रसूखदार लोगों के जुड़े रिश्तों के तारों के सामने ढीला पड़ गया। पूरे मामले में पहलेही राजतंत्र की मंशा स्पष्टï थी।

फिर भी यदि कोई गंभीर मामला इतना लंबा खिंचता है, तो उसका ऐसा ही हश्र होता है। आज औसजन तो गंगागाराम है, जिसके यह समझ में नहीं आ रहा है कि इस पूरे अध्ययाय में इटली का यह नटवर लाल जीता या भारत का शासनतंत्र हारा।

खैर, विपक्ष को एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर बहस से वंचित होना पड़ रहा है।
>>एस.सी. ·टारिया, रतलाम

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अब सुरभि ज्ञान स्पर्धा का आयोजन 31 अक्टूबर एवं 1 नवंबर को

Thursday, October 1, 2009

रतलाम। सुरभि संस्था द्वारा प्रदेश स्तरीय सुरभि ज्ञान स्पर्धा का आयोजन जो कि 3 व 4 अक्टूबर को आयोजित किया जाना था, त्यौहारों एवं विभिन्न सकूलों में छुट्टïी के कारण उक्त स्पर्धा का आयोजन 31 अक्टूबर एवं 1 नवंबर को प्रदेश के विभिन्न शहरों में किया जाएगा।

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बाबा साहेब ने समानता का समर्थन किया है, न कि अगड़ों-पिछड़ों को लड़ाने की वकालत की

Tuesday, April 14, 2009

प्रसंग: युग पुरूष, संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर की जन्म जयंती
पंकज व्यास, रतलाम
कुछ लोग होते हैं, जो समय के साथ नहीं चल पाते और पिछड़ जाते हैं, कुछ लोग होते हैं जो समय के साथ चलते है और अपना भविष्य गढ़ते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो समय को अपने साथ चलाते हैं और अपने साथ-साथ हजारों-लाखों लोगों का भविष्य गढ़ जाते हैं, ऐसे लोग कहलाते हैं युग पुरूष। संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर ऐसे ही युग पुरूषों में गिने जाते हैं, जिन्होंने समय की धारा को बदला, वे समय के साथ नहीं चले वरन् समय को अपने साथ चलने पर विवश किया और अपने साथ ही लाखों-करोड़ों देशवासियों का भविष्य निर्माण कर दिया।देश का शास्त्र संविधान लिखने वाले बाबा साहेब अंबेडकर का जीवन कठिनाईयों से भरा रहा, लेकिन अनेक कठिनाईयों से वे विचलित नहीं हुए वरन निश्चेत खड़े मिले। कहा जाता है, पहल करने वाला ही इतिहास रचता है, उन्होंने पहल की और एक ऐसा इतिहास रच दिया, जिसे भविष्य कभी विस्मृत नहीं कर सकेगा। वक्त बदला, वक्त के साथ समाज बदला और आज राजनैतिक पार्टियों में इस बात को लेकर हाहाकार मचा हैं, दावे हो रहे हैं कि वे ही बाबा साहेब के सपनों को साकार कर पाएंगे, वे ही बाबा साहेब के अनुगामी है, लेकिन हकीकत तो ये हैं कि ये दावे सिर्फ दावे ही रहे। जमीनी हकीकत उलट है। उनकी जन्म जयंती पर सब उन्हें याद भर कर लेते हैं और जब तब बाबा साहेब के नाम की माला जपते रहते हैं। हकीकत तो ये हैं कि राजनीतिक पार्टियों ने उन्हें वोट पाने का मार्का भर बना दिया है। आम जीवन में तो कहीं ऐसा नहीं लगता है कि उनका जीवन दर्शन परिलक्षित हो रहा हो। १४ अप्रैल को समग्र राष्ट्र बाबा साहेब की जन्म जयंति मना रहा है, ऐसे में जरूरत हो जाती है यह जानने कि कितने लोगों को यह समाज उठा पाया और कितने लोग घुटन भरी जिंदगी जी रहे हैं। वरना तो यूं ही जन्म जयंती मनती रहेगी, और बाबा साहेब की आत्मा संविधान के पन्नों में सिसकती रहेगी। अगर लोगों को गिराने का नहीं उठाने का काम हो, हराने के लिए नहीं जितने के लिए राजनीति हो तब तो कुछ बात बनें, वरना तो हम यूं जन्म जयंतियां मनाते रह जाएंगे और कुछ कर नहीं पाएंगे। हम यूं ही अगड़े, पिछड़े के लिए लड़ते रहेंगे, झगड़ते रहेंगे और मजा कोई दूसरा मार जाएगा। हम हाथ पर हाथ धरे रह जाएंगे और समानता की बातें बेमानी हो जाएगी। याद रखें बाबा साहेब ने समानता का समर्थन किया है, न कि अगड़ों-पिछड़ों को लड़ाने की वकालत की। बाबा साहेब का मकसद समाज में व्याप्त भेद-भाव को मिटाना रहा है, न कि भेद भाव को बढ़ाना। हम किस दिशा में जा रहे हैं, आप खूद उस पर विचार करें। वक्त की धारा पर जिसनेलिख दिया नाम अमिट अपना,कुछ हो जज्बा औ कुवत तो,कर दो पूरा उनका सपना।जयहिंद, जय भारत

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