ये सेवाभावी बाद में उडऩ छू न हो जाए?

पंकज व्यास
इन दिनों तो भौंपुओं की भरमार है। चुनाव का हो गया आगाज है। हर भौंपू जोर लगा-लगा कर अपने प्रत्याशी को सेवाभावी बता रहा है। मेरे मन में सवालों पर सवाल उठाए जा रहा है। अचानक सेवाभावी लोगों की बाढ़ कहां से आ गई है? लोगों में सेवा की भावना बहुत समा गई है?
मैं तो सोचता हूं, अब तो हमारा उद्धार हो जाएगा, समझ लो पूरा का पूरा विकास हो जाएगा, अब तो हमारे दिन फिर जाएंगे, विकास का पहिया घुम जाएगा, क्योंकि अब तो एक नहीं, कई कई सेवादार खड़े हो गए हैं, कई के अरमा बढ़े हो गए हैं।
पर, एक सवाल मुझे सता रहा है। चुनाव के बाद भी ये सेवादार सेवा में डटे रहेंगे? सेवा में लगे रहेंगे? या सेवा का ये भूत उतर जाएगा? क्या कोई सेवाभावी प्रत्याशी बाद में नजर आएगा? सेवा कि चिड़ीया उड़ जाएगी? सेवाभाविता जारी रहेगी?
बंधुओ, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है, मेरा दिल कह रहा है, ये सेवादार उडऩ छू हो जाएंगे और ढूंढे से भी नहीं मिल पाएंगे। कांश, ऐसा न हो, पर अब तक तो यही होता आया है, चुनाव के बाद सेवाभावी प्रत्याशी नजर नहीं आता है। पांच साल तक वनवास चला जाता है। आप बताओं आपका मन क्या कहता है? क्या सेवा के लिए सत्ता का स्वाद जरूरी होता है?

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