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ये भीड़ तंत्र नहीं, लोकतंत्र है...

>>पंकज व्यास एक जना आके मुझसे बोला, 'चुनाव में अलां उम्मीदवार जीत जाएगा और फलां उम्मीदवार हार जाएगा? मैं अवाक रह गया। उससे पूछा, भाया, तुम कैसे कह सकते हों, चुनाव के पहले चुनाव परिणाम बता रहे हों, क्या बात है? क्या तुम अंतर्यामी बन गए हों, ज्योतिष सीख लिया है? भविष्य वक्ता बन गए हों...? वो बोला, नहीं रे, ऐसी बात नहीं है। मैंने सवाल दागा, 'तो फिर कैसी बात है? उसने तपाक से कहा, 'अलां की सभा में बहुत भीड़ थी, फलां की सभा इने गिने लोग।' मैंने ·हा, 'तो? उसने मुंह खोला, 'आश्चर्य जताया कि अब भी नहीं समझे! जिसकी सभा में भीड़, वह जीता समझो। मैंने समझादारी दिखाई और उसे लगा समझाने, ऐसा नहीं होता है, ये भीड़ तंत्र नहीं, लोकतंत्र हैं। किसी की सभा में ज्यादा भीड़ आ गई, इसका मतलब ये थोड़ी की जीत गया, जिसको ज्यादा वोट मिलेंगे वो जीतेगा। 'फिर इस भीड़ का क्या मतलब? ये भीड़ क्यों जुटी? अगर लोगों को जिसकी सभा में जा रहे हैं, उसे नहीं जीताना है, तो वहां गए ही क्यों..?, ऐसे कई सवाल उसने दाग दिए? और सवालपूछूं मुद्रा में मुझे टकटकी लगाए देखने लगा? मैं फिर लगा फिर अपना ज्ञान झ...

हाय रे, वादे भी नसीब नहीं...,

>>पंकज व्यास ये विधानसभा के 2008 के चुनाव हो रहे हैं। अपने रतलाम में भी हो रहे हैं और उसके लिए जोरआजमाईश जारी है। सबके सब प्रदेश के गृह मंत्री हिम्मत कोठारी के पीछे पड़े हैं। चाहे कांग्रेस के प्रमोद गुगालिया हो, निर्दलीय प्रत्याशी पारस सकलेचा हो, बसपा के झालानी जी हो या फारवर्ड ब्लॉक के राष्ट्र pemi सुभाष अग्रवाल हो या कोई ओर... सबका कहना है कि हिम्मत कोठारी ने कुछ नहीं किया, कुछ नहीं किया 30 सालों में और हिम्मत कोठारी भी अपने कामों को बताने में लगे हैं कि मैंने ये किया वो किया... और आज बुधवार को बीजेपी का भोंपू भी गाड़ी में चित्कार, चित्कार कर कह रहा है कि आईए, देखने महलवाड़ा, हिम्मत कोठारी ने क्या विकास किया? सभा को संबोधित करने आ रहे हैं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह गुरुवार को शाम सात बजे। हर बार विधानसभा में अपन लोग सुनते हैं कि प्रत्याशी वादे करते हैं कि मैं ये कर दूंगा, वो कर दूंगा, अलां ..फलां... पर, पर, पर अबकी बार तो ·िसी सभा में ये सुनने को कम ही मिल रहे हैं। आश्वासन सुनने को कम मिल रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि अब कोई वादा नहीं बचा हो। अब तो आरोप-प्रत्यारोप ...