व्यंग्य: छुटभैये नेताजी और नाम

पंकज व्यास,रतलाम
जनता को चाहिए काम।
नेताजी को चाहिए नाम।।
जनता कहती काम बोलना चाहिए काम।
नेताजी कहते नाम होना चाहिए नाम।।
नेता-नाम की महिमा अपार।
जनता घनचक्कर बनती बारंबार।।
हर बार होता नाम का घमासान।
कभी तो कर दो नाम का सम्मान।।
नेताजी, बहुत हो गया नाम का प्रसार।
अबकी बार, कुछ तो कर दो सिरियसली काम।।
नगर निगम, नगर पालिका परिषद, पंचायतों, जनपद पंचायतों आदि के चुनाव आ गए और इसी के साथ लोकल पॉलेटिक्स में झकास निखार आने लगा है। अब, चाय की होटलों पर चुस्की लेते हुए, हेयर सेलूनों पर चुनावी कतरीन चलाते हुए, लोकल इलेक्शन की चर्चाएं होनी शुरू हो गई। ठंड अपना असर दिखा रही है, तो चुनावी गर्मी भी ठंड का असर बेअसर करने पर तुली है।
बात चली है चुनावी गर्मी की तो, बैठे बिठाए निठल्ले ठंडे-ठाये लोगों में पोलेटिक्स का करंट दौडऩे लगा है। जिसको देखो वो चुनाव में खड़ा होने की सोच रहा है, कुछ सोच ही रहे हैं, तो कुछ खड़े भी हो रहे हैं।
ऐसे ही चुनाव में खड़े होने की तमन्ना वाले एक नेताजी से हमने पूछ लिया- भैयेजी, आप खड़े हो रहे हैं। वे बोले-जी हां, जी हां। हमने कहा-भैये जीतने की अग्रिम बधाई, तो वे बोले बधाई-वधाई तो ठीक है, पर एक बात बताएं हम कोई जीतने के लिए थोड़े ही इलेक्शन में खड़े हो रहे हैं?
हमारी मोटी बुद्घि में बात घुसी नहीं। हमने तपाक से पूछ लिया-अमां, जीतने के लिए नहीं खड़े हो रहे हैं, तो फिर किसलिए...?
हमारी बात को सुनकर पहले तो छुटभैये नेताजी को हमारी बुद्घि पर तरस आया, फिर अपने ज्ञान का पिटारा खोला और हमारे कंधे पर हाथ रखते हुए अपने मुख से ज्ञान उढ़ेलने लगे व बोले-हम- हम जीतने के लिए थोड़े ही खड़े हो रहे हैं, अरे कलमकार हम तो नाम के लिए खड़े हो रहे हैं, नाम के लिए। जीते या हारे जाए भाड़ में। इसी बहाने नाम हो जाएगा, कि हम इलेक्शन में खड़े हुए थे। आगे नेताजी समझाते हुए हमसे बोले- ...और खुदा न खास्ता मजाक मजाक में जीत गए तो भैये मजा ही मजा है।
मैंने कहा- अच्छा तो ये बात है। अब हमें समझ में आया कि जगह-जगह इलेक्शन में केंडिडेटों की धड़ाधड़ भीड़ क्यों बढ़ रही है। हम तो समझे थे कि इत्ते सारे लोगों में अपने कस्बे, नगर, गांव के प्रति प्रेम उफान मार रहा है, तो कुछ काम करने के लिए लोग इलेक्शन में खड़े हो रहे हैं, पर अब सबको समझ जाना चाहिए कि यहां काम की नहीं, नाम की मारामारी है।
भैये, ये जनता समझती नहीं, हर चुनाव में नेताओं पर भनभनाती है, कि काम क्या किया, काम क्या किया.... हमरे एक फ्रेन्ड बोलते हैं, काम बोलना चाहिए काम। वही बात इस मुई जनता के दिमाग में घुसी हुई है, काम बोलना चाहिए काम।
पर इस मुई जनता को क्या मालूम कि अपने नेताजी को काम धाम से कोई मतलब नहीं, नाम में इंन्ट्रेस्ट है। जो लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है? वो जरा हमरे नेताजी से जाकर पुछिए, कि नाम में क्या रखा है? नाम की महिमा क्या है? अपने नेताजी का नाम होगा, कस्बे का नाम होगा, कस्बे का नाम होगा, तो देश का नाम होगा।
पर, क्या करें नेताजी, ये जनता नाम की महिमा समझती ही नहीं, सब आप जैसे समझदार थोड़े ही हैं। पर नेताजी, आप समझना, आप तो समझदार है। भैये जी, आप जैसे सबको नाम का चस्का नहीं लगा है और जिस दिन आपकी कृपा से जनता को नाम का चस्का लग जाएगा, उस दिन सब काम धाम बंद। नाम चमकाने का काम शुरू।
सुनकर के नेताजी बोले- वो सब तो खैर ठीक है। हम हमारा नाम और चमकाना चाहते हैं, इसलिए हमरे ऊपर वाले लीडर का जनम दिन मना रहे हैं। जरूर आईए।
तो भैया जी नेताजी ने हमें इन्वीटेशन दे दिया है। हम बड़े नेताजी का जनम दिन मनाकर आते हैं, तब तक आप नेता-नाम की महिमा समझिए और ज्यादा समझ में आ जाए, तो हमें भी समझाईए...। ठीक है ना...

पंकज व्यास,रतलाम

Comments

Nirmla Kapila said…
कुछ मिठाई जेब मे डाल कर हमारे लिये भी ले आयें अब चोर के घर चोरी का क्या डर? बहुत अच्छा व्यंग है शुभकामनायें

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