कहां है आदर्श जनकल्याणकारी राज्य, सहज में क्यों नहीं सुनी जाती आवाज

>>पंकज व्यास, रतलाम
हम गणतंत्र का 60 वां जश्न मना रहे हैं, लेकिन अब सोचने की जरूरत आ गई है, संविधान में प्रस्तावित एक आदर्श जनकल्याणकारी राज्य की दिशा में क्या हम आगे बढ़ पाए हैं। आज हम स्वतंत्रता का आवरण ओढ़े हैं,लेकिन आज भी हमारी आवाज सहज रूप से नहीं सुनी जाती, उसके लिए धरने, आंदोलन, अनशन करने पड़ते हैं। आम जनता तो ठीक विधायक, सांसद आदि जनप्रतिनधियों को भी आंदोलन को विवश होना पड़ता है, इससे बड़ी बात क्या होगी?

क्या जनकल्याण को रेखांकित करना खुद सरकार की जिम्मेदारी नहीं, जो आंदोलन की जरूरत है। इसका ताजा उदाहरण दिल्ली में लाल किले को लेकर दिए गए धरने का है, लाल किले से सलामी की खिलाफत की गई हैं और स्वतंत्र भारत के लिए भारत के अपने स्मारक की मांग की गई है।

बकौल तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के गोपाल राय, लाल किले पर एक भारतीय शहीद का नाम नहीं, द्वितीय विश्व युद्घ में शहीद हुए जर्मन सैनिकों के नाम अंकित है। इससे बड़ी शर्म की बात क्या होगी, जिस काम को सरकार को करने चाहिए, उस काम को करने के लिए आंदोलन की जरूरत पड़ती है और उल्टा देश को अंधेरे में रखा जाता है, यही नहीं नौबत यहां तक कि तीसरा स्वाधीनता आंदोलन वालों को अनशन करना पड़ता है। राजधानी के ये हाल हैं तो सब जगह क्या होंगे? सवाल कई हैं, लेकिन खास सवाल ये है कि अब भी आवाज सहज में क्यों नहीं सुनी जाती, आखिर कहां है जनकल्याणकारी राज्य?
संविधान में प्रस्तावना है कि भारत एक आदर्श जनकल्याणकारी राज्य होगा, लेकिन आज स्थिति इसके उलट है। आदर्श जनकल्याणकारी राज्य की बात तो दूर, हम जनकल्याण को साधने में भी सफल होते प्रतीत नहीं होते हैं।

एक समय था, जब हिंदुस्तां गुलाम था, तब अपनी आवाज, अपनी बात को उठाने के लिए जन आंदोलन, धरना, अनशन आदि का सहारा ले लिया जाता था, आज हम आजाद हैं, फिर तो सहज रूप से जन-जन की आवाज सरकार को सुननी चाहिए, पर क्या ऐसा हो रहा है? जवाब, आपका नहीं में ही होगा। आज भी गरीब, मजलूम, असहाय लोगों की आवाज दबा दी जाती है, और हम विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र होने का दंभ भरते जाते हैं।

लाल किले का ही उदाहरण ले लें। बकौल तीसरे स्वाधीनता आंदोलन के गोपाल राय, जिस लाल किले पर आजादी के बाद से सलामी लेते, देते आ रहे हैं, वो गुलामी का प्रतीक है। उस पर एक भी हिंदुस्तानी शहीद का नाम नहीं है, वरन् उस पर द्वितीय विश्व युद्घ में मारे गए सैनिकों के नाम अंकित है। सबसे बड़ी बात तो ये है, जो काम सरकार को करना चाहिए, वो तीसरे स्वाधीनता आंदोलन वाले कर रहे हैं और हद तो तब हुई जब उन्हें आमरण अनशन करने की नौबत आन पड़ी। जबकि, होना तो यह चाहिए था कि उनकी आवाज को तवज्जो दी जाती। उनकी मांग कोई नाजायज तो है नहीं, जो मानी न जाए। उनका कहना सही भी है कि जिस लाल किले पर एक भी भारतीय शहीद का नाम अंकित नहीं, अगर, वे भारत के लिए एक अलग से स्मारक की मांग करते हैं, तो इसमें बुरा क्या है?ï

सवाल इतना सा नहीं है। सवाल तो इससे भी बड़ा है कि क्यों देश की सरकारों ने पूरे राष्टï्र को आजादी के बाद से आज तक अंधेरे में रखा और लाल किले को महिमा मंडित करते रहे? क्या लाल किले की हकीकत से सरकार अनजान थीं या उसने जानने की जरूरत नहीं समझी? जो काम तीसरa स्वाधीनता आंदोलन वाले कर रहे हैं, वो काम क्या खुद सरकार का नहीं है?

क्या देशभक्ति की बात करना सरकारों के हिस्से में नहीं आता? क्या जनकल्याण करना सरकारों का दायित्व नहीं हैं?
जब देश की राजधानी दिल्ली के ये हाल हैं। लाल किले की सत्यता से सरकार अनजान है, तो देश के अन्य भागों में क्या हो रहा है, क्या इसकी जानकारी सरकार को है?

बात करें जनकल्याण की तो ये बात किसी से छुपी नहीं है कि एक सेवानिवृत्त कर्मचारी को भी अपना सेवानिवृत्ति प्रकरण सुलझाने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है, आमजन को रजिस्ट्री करवाने के लिए बाबुओं की जी-हजुरी करनी पड़ती है, एक आम आदमी को सरकारी दफ्तर में काम होता है, तो वह जाने से पहले दस बार सोचता है कि कहीं उसकी चप्पल न घिस जाए। सरकारी अस्पतालों के हालात क्या होते हैं, किसी से छुपा नहीं है।

भ्रष्टïाचार ने आम आदमी को लील लिया है। देश के युवा और ऊर्जावान प्रधान मंत्री ने कहा था कि केन्द्र से 100 पैसे निकलते हैं, तो आम जन तक केवल 15 ही पहुंच पाते हैं और 85 भ्रष्टïाचार में चले जाते हैं।

जो भ्रष्टïाचार में लिप्त हैं, उन अधिकारियों, कर्मचारियों की देशभक्ति कहां चली गई। मुझे समझ नहीं आता कि उनमें देशभक्ति का ज्वार क्यों नहीं फूटता? आप यकीन मानिए, जिस दिन इस देश के भ्रष्टï अधिकारी, ·र्मचारियों में देशभक्ति जाग जाएगी, उस दिन देश की आधी समस्याओं का हल हो जाएगा।

हम चाहें नेताओं की लाख बुराईयां कर लें, लेकिन हकी·त तो ये है कि नेता तो 5 साल राज करते हैं, लेकिन यथार्थ में असली राज तो अफसरशाही का ही है। ये वो ही अफसर होते हैं, जो चाहे तो नेताओं को अंधेरे में रख सकते हैं, चाहे तो उनके काम में मदद कर सकते हैं। ये चाहें तो देश को अर्श पर ला सकते हैं और चाहे तो फर्श पर।

आप सूचना के अधिकार को ही ले लें, सरकार बड़े नेक इरादे से शासन को पारदर्शी बनाने के लिए सूचना के अधिकार का कानून लेकर आई, लेकिन यदाकदा सूचनाएं न देने के समाचार सुनने व पढऩे को मिल ही जाती है।

दरअसल, हमारे यहां ठीक से कॉम्बिनेशन नहीं हो पा रहा है। सरकार जनकल्याण चाहती है, तो अफसरशाही आड़े आती है और अफसर ईमानदार हो जाते हैं, तो नेता घपलेबाज। हकीकत में हमारे यहां गुड आईडिया वाले लोग तो बहुत है। सरकार भी जनकल्याण नहीं चाहती है, ऐसा नहीं। सरकार तो जनकल्याण चाहती है, लेकिन ऐसा लगता है प्रशासन में निष्ठïावान लोगों की कमी हो गई है।

एक दूसरा पहलू यह पिछले चुनावों के समय देखने को आया कि जनप्रतिनिधि विधायक निधि से, सांसद निधि से किसी और कोष से जनकल्याण के कार्य स्वीकृत करवाते हैं, उद्घाटन करते हैं, लोकार्पण करते हैं, तो प्रचारित तो ऐसा करते हैं मानो ऐहसान करते हों, जबकि उनका यह फर्ज बनता है कि वे जनकल्याण के काम करे।

लेकिन नहीं, वे तो ऐसा जताते हैं कि मानों उन्होंने जनकल्याण के कार्य स्वीकृत कर जनता पर अहसान किया हो। संविधान में जनकल्याणकारी राज्य की अवधारणा है और हमारे जनप्रतिनिधियों, अफसरों, नौकरशाहों, कर्मचारियों का कर्तव्य बनता है कि वे जनकल्याण में रत रहे। इस बात को हमें समझना होगा, तभी हम एक आदर्श जनकल्याणकारी राज्य की दिशा में आगे बढ़ पाएंगे।

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