कहीं मीडिया सरकारी प्यानो न बन जाए

पंकज व्यास, ratlam
किसी महान विचारक ने ठीक ही कहा है कि मीडिया वह प्यानो है, जिस पर अगर सरकारी नियंत्रण हो जाए, तो वह उसमें से सरकार अपने हिसाब से सूर निकालेंगी। सरकार जिस तरह से कानून लाना चाहती है, उससे तो साफ जाहिर होता है कि मीडिया से अब अपने हिसाब से सूर निकालने का मन बना लिया गया है।
अगर, सरकार की मंशा यही है, तो समझिए कि वह दिन दूर नहीं जब मीडिया सरकारी भोंपू बन जाएगा, जिसमें से वहीं आप सुन-पढ़ पाएंगे जो सरकारें चाहेगी। मीडिया सरकार के हाथों की कठपुतली और जन-जन बेबस, जनता की आवाज पर ताला और चारों तरफ सरकारी राज और लोकतंत्र को खतरा..
.विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में लोक-आवाज को पाबंदी लगाने की तैयारी और वह भी ऐसे समय जब गणतंत्र का महापर्व 26 जनवरी आने को हैं, अपने आप में कई सवाल पैदा करती है। वैसे भी मीडिया पर अुंगली उठाना अब फैशन बन गई है, कहीं यह फैशन रिवाज न बन जाए...
देखो इस फैशन-फैशन में कहीं ऐसा न हो कि यह फेशन गले की हड्डïी बन जाए, मीडिया सरकारी प्यानों बन जाए , जिसमें से सरकारी सूर भर सुनाई देते रहे और लोक-आवाज गुम हो जाए,
उठो, जागो जनता की आवाज कहीं बंधक न बन जाए। इसके लिए लौकतंत्र के पैरोकारों को जागना ही होगा।

(और जानने के लिये आइए, विरोध करें ताकि हम मुंह दिखा सकें मीडिया पर सरकारी नियंत्रण के लिए 'काला कानून' ! पर क्लिक करें यहाँ भी )

Comments

मीडिया तो हमेशा से ही किसी न किसी का भोंपू रहा है. निष्पक्ष मीडिया तो केवल सोचने की बात है. अब सरकारी भोंपू को ही ख़राब क्यों कहा जाए?
Hamara Ratlam said…
आज का मीडिया विदेशों से संचालित होता है वो कम से कम हमारे देश से संचालित होने लगेगा।

Popular posts from this blog

अब नहीं होती बाल सभाएं, केवल एक दिन चाचा नेहरू आते हैं याद

निरंतर लिखो, आलोचकों की परवाह मत करो -बैरागी

व्यंग्य: छुटभैये नेताजी और नाम